ख्वाइशों के इस समंदर में,
एक छोटी सी ख्वाइश थी अपनी।
मेहनत की भी अपनी बात थी,
पर क्या इतना काफी होता है?
तुम क्या जानो,
कितना फासला होता है,
बस एक छोटी रेखा से,
कहीं सपने टूटते हैं,
संघर्ष की भी होती है दास्ताँ,
उसे तो भुला देते हो,
पर संघर्ष ही जीवन है,
इसे तो तुम नहीं छीन सकते।।
एक छोटी सी ख्वाइश थी अपनी।
मेहनत की भी अपनी बात थी,
पर क्या इतना काफी होता है?
तुम क्या जानो,
कितना फासला होता है,
बस एक छोटी रेखा से,
कहीं सपने टूटते हैं,
कहीं खुशियां घर आती हैं
संघर्ष की भी होती है दास्ताँ,
उसे तो भुला देते हो,
पर संघर्ष ही जीवन है,
इसे तो तुम नहीं छीन सकते।।
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