Sunday, 24 August 2014

मंज़िल नहीं है दूर

चले थे सही दिशा की ओर ,
पाटने मंज़िल के फासले को। 
थी तैयारी ना होने का एहसास ,
पर मन में था विश्वास की  डोर।।

पर था कुदरत को कुछ और मंजूर ,
वक़्त पर तो ले आया था गन्तव्य पर। 
पर उसने दिया इस दिल को तोड़ ,
और मन में भर दिया  निराशा की डोर।।

क्या ऐसा भी होता है ,
उम्मीदों का जहाँ ऐसे भी टूटता  है। 
पर ये तो है सफर की शुरुआत ,
और मंज़िल नहीं है दूर।।



Friday, 27 June 2014

उम्मीद

अब तो मुस्कुराना आदत सी हो गयी है ,
हँसना इक फितरत सी हो गयी है।
कब बदलेगा ये मुकद्दर का फ़साना ,
अब तो उम्मीद भी इक चाहत सी हो गयी है।