चाहत थी कुछ ऐसी ,
कि मैं कुछ अच्छा कर जाऊँ।
मार्ग में बाधाएं कम आयें ,
ताकि मैं आसानी से पार कर पाऊँ।
पुरा तो हुआ चाहत का आशियाना ,
पर हो गया हूँ खुद से बेगाना।
छायी है इक धुंध चारों ओर ,
मुश्किल लगने लगी है ज़िन्दगी की डोर।
आयी है इम्तेहान की घड़ी ,
रखना खुद को सँभाल के।.
छोड़ न देना नाव को मझधार में
अभी काफी पराव है बाकी।
जीत लूँगा इस ज़ंग को भी ,
अभी हौसला है बांकी।
कि मैं कुछ अच्छा कर जाऊँ।
मार्ग में बाधाएं कम आयें ,
ताकि मैं आसानी से पार कर पाऊँ।
पुरा तो हुआ चाहत का आशियाना ,
पर हो गया हूँ खुद से बेगाना।
छायी है इक धुंध चारों ओर ,
मुश्किल लगने लगी है ज़िन्दगी की डोर।
आयी है इम्तेहान की घड़ी ,
रखना खुद को सँभाल के।.
छोड़ न देना नाव को मझधार में
अभी काफी पराव है बाकी।
जीत लूँगा इस ज़ंग को भी ,
अभी हौसला है बांकी।
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